उद्धव ठाकरे और नारायण राणे के बीच की तल्‍खी नई तो नहीं है

महाराष्ट्र | महाराष्ट्र के ताजा सियासी बवाल पर हैरान होने वालों को पुरानी बातें याद करनी चाहिए। उद्धव ठाकरे और नारायण राणे के बीच की तल्‍खी नई तो नहीं है। इसकी शुरुआती झलक तो 2003 से ही मिलने लगी थी। तब महाबलेश्‍वर की एक सभा में शिवसेना ने उद्धव को ‘कार्यकारी अध्‍यक्ष’ घोषित किया था। राणे ने इसका खुलकर विरोध किया था, वे उद्धव के नेतृत्‍व के खिलाफ थे। साल भर बाद विधानसभा चुनाव हुए। पार्टी की हार के बाद राणे ने आरोप लगाया कि पद और टिकट बेचे जा रहे हैं। 

शिवसेना विधायक दल के नेता पद से इस्तीफा देकर राणे ने कांग्रेस का दामन थाम लिया। इसके बावजूद, तत्‍कालीन अध्‍यक्ष बालासाहेब ठाकरे ने राणे को ‘पार्टी विरोधी गतिविधियों’ के चलते बाहर कर दिया। 2005 में राणे ने मालवण विधानसभा सीट से हुए उपचुनाव में अपने ‘अपमान’ का बदला ले लिया। उस चुनाव में बालासाहेब ठाकरे की भावुक अपील कोई काम नहीं आई। राणे के आगे शिवसेना उम्‍मीदवार की जमानत तक जब्‍त हो गई थी। 

राणे ने BMC, कोंकण में बनाई शिवसेना की पैठ 

शिवसेना में ‘शाखा प्रमुख’ के पद से शुरुआत करने वाले नारायण राणे ने बड़ी तेजी से सियासत की सीढ़‍ियां चढ़ीं। जल्‍द ही राणे BMC कॉर्पोरेटर बन गए, फिर बिजली सप्‍लाई वाली कमिटी के चेयरमैन। राणे का सूरज इतनी तेजी से चढ़ा कि 1999 में वह मनोहर जोशी की जगह महाराष्‍ट्र के मुख्‍यमंत्री भी रहे, अलबत्‍ता बस कुछ महीनों के लिए। शिवसेना के दिनों में राणे की गिनती उन चुनिंदा लोगों में होती थी जो मुंबई की सड़कों पर शिवसेना की हर बात लागू कराते थे। 

2004 में हारते ही फूट पड़ा राणे का गुस्‍सा 

घर जलाए जाने पर राणे को पार्टी से कोई सहानुभूति नहीं मिली। ऊपर से उनके नेतृत्‍व पर सवाल खड़े किए गए। यह वो वक्‍त था जब पार्टी के भीतर बाल ठाकरे की जगह उद्धव के कमान संभालने की अटकलें जोर पकड़ने लगी थीं। खबरें आती थीं कि उद्धव इस वजह से राणे के पर कतर रहे हैं क्‍योंकि उनकी राज ठाकरे से अच्‍छी बनती है। 2004 के विधानसभा चुनाव इन दोनों के रिश्‍तों का अहम मोड़ साबित हुए।

शिवसेना चुनाव हार गई और हारते ही राणे फट पड़े। उन्‍होंने दावा किया कि टिकट बेचे गए थे। निकाले जाने से बचने के लिए उन्‍होंने जुलाई 2005 में खुद ही इस्‍तीफा दे दिया, मगर पार्टी ने फिर भी उन्‍हें बाहर कर दिया। राणे ने पार्टी से निकाले जाने के बावजूद तेवर नरम नहीं किए। उन्‍होंने उद्धव पर और करारे हमले शुरू किए। सड़कों पर राणे के समर्थक उद्धव के करीबियों से भिड़ने लगे। 

2005 का वो उपचुनाव, नहीं काम आई बालासाहेब की अपील  

राणे ने विधानसभा की सदस्‍यता से इस्‍तीफा दिया तो उनकी सीट पर उपचुनाव की जरूरत पड़ी। तब तक राणे कांग्रेस में शामिल होकर महाराष्‍ट्र सरकार में राजस्‍व मंत्री बन चुके थे। मतदान की तारीख 19 नवंबर 2005 तय हुई। शिवसेना ने राणे के खिलाफ पूरी ताकत झोंक दी। बालासाहेब ठाकरे ने इस चुनाव को अपनी इज्‍जत का सवाल बना लिया था। शिवसेना का हर बड़ा नेता मालवण में चुनाव प्रचार करने पहुंचा था। बीमार होने के बावजूद खुद बालासाहेब भी आए। एक भावुक बयान में उन्‍होंने यह तक कह दिया कि सिंधुदुर्ग की सभा उनकी आखिरी जनसभा थी। मगर नतीजों पर इसका कोई असर नहीं पड़ा। 

जीतते ही राणे ने मांगा उद्धव का इस्‍तीफा   

नारायण राणे ने शिवसेना के परशुराम उपरकर को 63,372 वोटों से करारी शिकस्‍त दी। शिवसेना उम्‍मीदवार की जमानत तक जब्‍त हो गई थी। मतगणना के रोज पार्टी के मुखपत्र ‘सामना’ में बाल ठाकरे ने लिखा था, “अगर आज राणे जीतता है तो यह हारे हुए लोगों की जीत होगी। राणे ने दावा किया था कि उनके खिलाफ कोई नहीं लड़ सकता लेकिन उपरकर किसी पहाड़ की तरह उसके आगे खड़ा रहा और राणे की हार तभी हो चुकी थी।” जीत के बाद राणे ने सेना के कार्यकारी अध्‍यक्ष उद्धव ठाकरे का इस्‍तीफा मांगते हुए कहा कि मालवण में हार की जिम्‍मेदारी लेते हुए उन्‍हें पद छोड़ देना चाहिए।

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