ये कैसा चुनाव है जहां लोकतंत्र के प्रहरी पत्रकारों को मतदान करने की अदा करनी होती है कीमत, आइये जाने कैसे होता है चुनाव !

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खालिद रहमान
लोकतंत्र के चैाथे स्तम्भ पत्रकारिता के प्रहरी पत्रकारों ने अपने संगठन के चुनाव मे एक ऐसी परम्परा डाली है जिसने देश भर के करोड़ो मतदाताओ को हैरत मे डाल दिया है । मतदान से जुड़ी ये ऐसी परम्परा है जहां प्रत्याशी को मतदाता को रिझाने के लिए नही बल्कि मतदाता को ही मतदान करने के लिए पैसा देकर चुनाव से पहले रजिस्ट्रेशन कराना पड़ता है। जबकि दुनिया मे कोई ऐसा चुनाव नही होता है जहां मतदाता को मतदान करने से पहले बाकायदा उसकी कीमत चुकानी पड़े लेकिन उत्तर प्रदेश के सचिवालय मे वर्षो से हो रहे Utter Pradesh राज्य मुख्यालय संवाददाता समिति के चुनाव मे यही परम्परा चली आ रही है।
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reporter
हालाकि लिखा पढ़ी मे शायद ऐसा कोई प्रावधान नही है कि चुनाव से पहले मतदाता को मतदान करने के लिए सौ रूपए शुल्क जमा करके रजिस्ट्रेशन कराना आवश्यक हो। लोकतंत्र के चैाथे स्तम्भ से जुड़े चुनाव का मौसम आ गया है जहां अध्यक्ष, उपाध्यक्ष , सचिव, संयुक्त ,सचिव , कोषाध्यक्ष व कार्यकारिणी सदस्य के चुनाव का बिगुल बज चुका है 15 अप्रैल को चुनाव है प्रत्याशियो ने नामांकन भी दाखिल कर दिए है इन सबके बीच सोशल मीडिया के जरिए इस चुनाव मे मतदान करने वाले मतदाताओ तक सूचना पहुॅचाई गई है कि यदि उन्हे मतदान करना है तो वो तय तिथि मे सौ रूपए शुल्क जमा कर मतदान करने के लिए अपना रजिस्ट्रेशन करा ले अन्यथा उन्हे मतदान से वंिचत रहना पड़ेगा।
इस चुनाव मे मतदान करने वाले मतदाताओ की सख्या की अगर बात करे तो सख्या लगभग सवा सात सौ है इस हिसाब से प्रत्येक मतदाता से वसूली जाने वाली रजिस्ट्रेशन फीस का आकड़ा 70 हजार के पार पहुॅच जाता है इसी तरह इस चुनाव मे जीतने के लिए अपनी किस्मत आजमा रहे प्रत्याशियो की सख्ंया भी लगभग सौ के करीब है प्रत्याशाी को चुनाव लड़ने के लिए दो सौ रूपए जमा करने पड़ते है इस हिसाब से लगभग 20 हजार रूपए इस मद से एकत्र हो जाता है कुल मिला कर एक लाख रूपए के करीब चुनाव से पहले रकम एकत्र हो जाती है लेकिन इस धन का खर्च किस मद मे किया जाना है ये किसी पत्रकार समिति ने आज तक सुनिश्चित नही किया हम ये नही कह रहे है कि चुनाव के नाम पर यहा कोई भ्रष्टाचार हो रहा है या धन वसूली हो रही है लेकिन सवाल पूछने का हक सिर्फ पत्रकार को ही नही है बल्कि जनता को भी है ।
सोशल मीडिया पर मतदाता रजिस्ट्रेशन फीस वाला मैसेज वाईरल होने के बाद जनता ये सोंच रही है कि किसी भी चुनाव मे पत्रकार प्रत्याशियो की इस टोह मे लगे रहते है कि कहीं कोई प्रत्याशी किसी मतदाता को रिझाने के लिए पैसा तो नही बाट रहा है और अपने संगठन के चुनाव मे यही पत्रकार अपने ही मतदाताओ से पैसा वसूल रहे है। जनता के अगर मन मे शंका ने घर बना लिया तो हम पत्रकारो का ये फजर््ा बनता है कि हम जनता को ऐसा जवाब दे जिससे जनता संतुष्ट हो जाए । हमे उम्मीद है कि इस बार चुनावी समर मे उतरे सभी प्रत्याशी जनता को ये जरूर बताएंगे कि हर चुनाव से पहले मतदाताओ से लिए गए पैसे किस मद मे कब कब और कितने कितने खर्च किए गए ।
अगस्त 2015 मे इस चुनावी समर मे एक नही बल्कि दो गुट उतरे थे एक गुट के अध्यक्ष थे श्री प्राश्ंाु मिश्रा तो दूसरे गुट के अध्यक्ष थे श्री हेमंत तिवारी दोनो ही गुटो ने तब से लेकर अब तक पत्रकारो के हित के लिए काम करने का दावा भी किया लेकिन उत्तर प्रदेश मे मान्याता प्राप्त और गैर मान्यता प्राप्त कितने पत्रकारो का भला इन समितियो ने कराया ये इन समितियों को ही बताना चाहिए हां मुझे याद है कि 2015 मे उत्त्र प्रदेश राज्य मुख्यालय संवाददाता समिति के चुनाव मे निर्वाचित हुए प्रांशु मिश्रा गुट के काजिम रजा के प्रस्ताव पर मतदाताओ से वसूली गई रकम मे से 55 हजार रूपए एक दिंगत पत्रकार की सहायता के लिए दिए गए थे।
इसके अलावा उत्त्र प्रदेश राज्य मुख्यालय संवाददाता समिति ने हजारो पत्रकारो के लिए क्या किया ये इन्ही को पता होगा वैसे मुझे तो इनकी समिति द्वारा किया गया कोई ऐसा बड़ा काम याद नही जो कभी किसी गैर मान्यत प्राप्त पत्रकार की सहायता के लिए किया गया हो। अपने लिए तो जानवर भी जीता है इन्सान वही है जो दूसरो के लिए भी जिए पत्रकार एक ऐसी जाति है जो दूसरो के लिए ही अपने जीवन का बहुताय हिस्सा गुजारता है।
फिर मान्यता प्राप्त और गैर मान्यता प्राप्त पत्रकारो के बीच ये दूरी क्यूं है । हमे आशा है कि इस बार के चुनाव मे निर्वाचित होने वाली कमेटी इस दूरी को समाप्त करने के लिए गौर जरूर करेगी। बदलाव तो प्रकृति का नियम है केन्द्र हो या प्रदेश हमेशा ही एक पार्टी की हमेशा सरकारे नही रहती है अब देखना ये है कि इस बार चुनाव के मैदान मे उतरे पुराने दिग्गज ही जीत का परचम लहरा कर पुरानी परम्पराए जारी रखते है या फिर पैसा देकर मतदान का अधिकार पाने वाले मतदाता अपने मनपसन्द प्रत्याशी को जिता कर यहंा परिवर्तन लाकर सभी पत्रकारो की भलाई के लिए कुछ नया करते है।
सबसे बड़ी और महत्वपूर्ण समस्या तो ये है कि पत्रकारो की भलाई की बात करने वाले सरकारी मान्यता प्राप्त पत्रकार को ही इस चुनाव मे मतदान करने का अधिकार है वो भी राज्य मुखयालय की मान्यता प्राप्त ही हेना चाहिए। गैर मान्यता प्राप्त तो छोड़ दीजिये जिला स्तर की मान्यता वाले पत्रकार भी इस चुनाव मे हिस्सा नही ले सकते है। चुनाव मे किसी भी तरह की हिस्सेदारी न रखने वाले हजारो पत्रकारो का तो इश्वर ही मालिक है ।
कुल मिला कर पत्रकारो का ये चुनाव ऐसा प्रतीत हो रहा है जैसे ये पत्रकार समिति का चुनाव न होकर राज्य सभा का चुनाव हो। यहां इस चुनाव मे जातीय समीकरण भी बन बिगड़ रहे है। ये भी देखा जा रहा है कि जीतने की क्षमता रखने वाले प्रत्याशी की छवी को धूमिल करने के लिए उसे डमी साबित करने के लिए काना फूसी भी चल रही है। 15 अप्रैल को हो कुछ भी लेकिन सवा सात सौ मतदाताओ को अब ये साबित करना है कि वास्तव मे अब उन्हे राज्य मुख्यालय की मान्यता का इस्तेमाल पत्रकारो की भलाई के लिए करना है । अन्त मे सभी प्रत्याशियो को हमारी शुभ कामनाए !
 

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