ये रहे हैं गुजरात चुनाव के गेम चेंजर

ये रहे हैं गुजरात चुनाव के गेम चेंजर

 

 

आज कल हर जुबान पर एक ही चर्चा है- गुजरात का ताज किसके हाथ लगेगा? कोई कहता है नोटबंदी और जीएसटी को लेकर नाराजगी भीतर तक समा गई है, इसलिए बीजेपी की हार तय है. तो कोई कह रहा है पाटीदारों की नाराजगी और हार्दिक पटेल की युवाओं और पाटीदारों में अपील बीजेपी पर भारी पड़ेगी. चर्चा ये भी हो रही है कि ओबीसी नेता अल्पेश ठाकोर या फिर दलित नेता जिग्नेश मवानी का कांग्रेस को समर्थन कांग्रेस की नाव पार लगा सकता है.

दिल्ली में मंथन का दौर जारी है. लेकिन दूर गुजरात में हर किरदार लगा है अपनी भूमिका को और धार देने में. राहुल गांधी के रोड शो में हार्दिक और अल्पेश की धूम रहती है. इसमें कांग्रेस की अदरूनी लड़ाई की बातें सामने नजर नहीं आ रहीं हैं. लेकिन जानकार तो यही पुछ रहे हैं कि कांग्रेस के कार्यकर्ता कहां हैं?

राहुल गांधी के रोड शो में भीड़ तो उमड़ रही है, लेकिन वे हार्दिक, अल्पेश या फिर जिग्नेश के समर्थक हैं. इस भीड़ को वोट में बदलने के लिए जिस कार्यकर्ता की कांग्रेस को जरूरत है, आखिर वो कहां हैं. बीजेपी और संघ की इस प्रयोगशाला में जाति आधारित वोटिंग की राह पर ले जाने की कांग्रेस की ये कोशिश कितनी रंग लाएगी ये साफ नहीं. क्योंकि अब तक कांग्रेस आयात किए गए किरदारों के सहारे ही आगे बढ़ रही है. हर चुनाव में ऐसा लगता है कि राहुल या फिर सोनिया गांधी भारी पड़ने लगे हैं और कोई मुद्दा ऐसा उभर आता है जो गेम चेंजर साबित होता है.

हम बताते हैं साल 2002 से अब तक के मोदी राज के गुजरात के गेम चेंजर क्या-क्या रहे हैं…2002 के विधानसभा चुनाव
एक ऐसा चुनाव जहां पूरी ताकतें लगीं थी मुख्यमंत्री मोदी के हराने में. 26 जनवरी 2001 के भूकंप के झटके से गुजरात उबर तक नहीं पाया था. नरेंद्र मोदी जो बीजेपी के राष्ट्रीय महासचिव थे उन्हें भूकंप राहत के लिए बनी समिति का अध्यक्ष बना कर अहमदाबाद भेजा गया था. लेकिन तब पार्टी और प्रशासन दोनों पर मुख्यमंत्री केशूभाई पटेल का कब्जा था. लिहाजा मोदी का रोल सिमट कर ही रह गया. लेकिन जब वो मुख्यमंत्री बन कर लौटे तो कई स्थानीय नियाय के चुनावों में बीजेपी का हार का सामना करना पड़ा. बीजेपी का ग्राफ गिरने लगा था. ऐसे में गोधरा की घटना हो गई और उसके बाद गुजरात में जो हुआ उसने सबको हिला कर रख दिया. पूरी दुनिया को मौका मिल गया सीएम मोदी पर हल्ला बोलने का. पार्टी के भीतर तक उन्हें हटाने की मुहिम तक चली. लेकिन बचते बचाते मोदी आगे बढते गए. लेकिन इस घटना ने गुजरात का ऐसा ध्रुविकरण किया कि मोदी को उखाड़ फेंकने की कांग्रेस से लेकर तमाम ताकतों की कोशिशों को वोटरों ने नकार दिया. हिंदू हृदय सम्राट बन कर उभरे मोदी पर गुजरात की जनता ने इतना भरोसा किया कि बहुमत की चिंता करनी ही नहीं पड़ी. यानी साल 2002 का गेमचेंजर रहा गोधरा कांड.

साल 2007
पांच साल की एंटी इनकंबेंसी थी. ऊपर से मोदी की कार्यशैली को लेकर अपने ही सवाल उठाने लगे थे. सीएम मोदी की कार्यशैली को लेकर पूर्व मुख्यमंत्री केशूभाई पटेल ने गुजरात में मिनी इमरजेंसी की बात कर दी थी. गुजरात के वरिष्ठ नेता लगे थे सीएम मोदी को बदलने की मुहिम में. लेकिन आडवाणी, जेटली और गुजरात के प्रभारी महासचिव ओम माथुर ने साथ दिया और पार्टी के भीतर का विरोध को समाप्त कर दिया. चुनावों तक पार्टी के भीतर विरोध समाप्त हो गया था. लेकिन कांग्रेस खामोश नहीं थी. सोहराबुद्दीन और कुछ दूसरे इनकाउंटरों को लेकर कांग्रेस सवाल उठा रही थी. केंद्र में कांग्रेस सत्ता में थी और न ही उनके पास रिसोर्स की कमी थी. मोदी लगे थे बुथ स्तर तक पार्टी कार्यकर्ताओं को जोश दिलाने में और हर सीट की रणनीति बनाने में. इस बार वो अकेले स्टार प्रचारक थे. कांग्रेस ने अपने ट्रंप कार्ड सोनिया गांधी को मैदान में उतारा. एक रैली में उन्होंने नरेंद्र मोदी को मौत का सौदागार क्या कहा पूरा चुनावी माहौल ही बदल गया. मोदी ने एक बार फिर गुजरात की जनता को भरोसा दिलाने में सफल रहे कि वही गुजरात के असली नेता हैं. एक बार फिर मोदी सीएम बन गए. साल 2007 का गेम चेंजर रहा सोनिया गांधी का मोदी को मौत का सौदागर कहना.

साल 2012
साल 2007 के बाद मोदी की नजरें दिल्ली पर टिक गईं. 2011 में अहमदाबाद में उन्होंने 3 दिनों का सद्भावना अनशन भी किया. वह भी उस वक्त जब आडवाणी ने अपनी देश भर की यात्रा शुरू की थी. साल 2009 की हार के बाद आडवाणी 2014 में भी नेतृत्व संभालने को तैयार थे. लेकिन मोदी इस बार पीछे नहीं हटने वाले थे. दोनों नेताओं के बीच तनातनी साफ नजर आने लगी थी. दूसरे की पार्टी के शीर्ष नेता के सामने खड़े होकर उन्होंने जता दिया कि वो नेतृत्व संभालने के लिए तैयार हैं. पूरे परिवार में संदेश भी यही गया. ये एक ऐसा अनशन था जहां उन्होने सभी धर्मों के लोगों को मंच पर न्यौता दिया. दिल्ली से लेकर मुंबई और सूदूर चेन्नई तक से उनके सभी राजनीतिक मित्र इसमें शामिल हुए. इसने न सिर्फ उनका राष्ट्रीय स्तर पर कद बढ़ा दिया बल्कि दिल्ली जाने की उनका मंशा भी साफ कर दी. तो दूसरी तरफ एक मौलाना के हाथों से टोपी न पहन कर अपने वोटरों को भी संदेश दे दिया. 2012 तक गुजरात की जनता को मोदी ने यही संदेश दिया पहले गुजरात जीतेंगे फिर दिल्ली की बारी. पटेलों के सबसे बड़े नेता केशूभाई पटेल भी अलग पार्टी बना कर लगे थे मोदी को हराने में. लेकिन पटेल वोट बीजेपी से नहीं खिसके. गुजरात की जनता ने सीएम मोदी पर एक बार फिर भरोसा जताया. वोट पार्टी नहीं मोदी के नाम पर मिले क्योंकि गुजरात के वोटरों और कार्यकर्ताओं को दिल्ली में पीएम की कुर्सी नजर आने लगी थी. 2012 का गेमचेंजर रहा अब दिल्ली की बारी है का नारा.

2014 लोकसभा चुनाव
गुजरात की जनता के सभी 26 सीटें बीजेपी को दीं, क्योंकि उन्हें मोदी बतौर पीएम चाहिए था.

2017 विधानसभा चुनाव
नतीजे आने बाकी हैं. कांग्रेस पुराने खाम फार्मुले को दोहराने में लगी है. पाटीदार, ओबीसी और दलितों के शीर्ष नेताओं को साथ लेकर चल भी रही है. 2014 से अब तक दो सीएम बदल चुकी बीजेपी विजय रुपाणी के नेतृत्व में चुनावों में कूद चुकी है. लेकिन अभी तुरूप का पत्ता यानी पीएम मोदी खुल कर मैदान में नहीं उतरे हैं. उनके मैदान में कूदने से पहले ही कांग्रेस ने विकास पागल हो गया है, युथ कांग्रेस ने एक बार फिर चाय़वाला के नाम से ट्वीट कर मजाक उड़ाया है. बीजेपी नेता मान रहे हैं कि चायवाले वाला ट्वीट भी गेम चेंजर साबित हो सकता है. आखिर मोदी से बड़ा ओबीसी नेता देश में कौन होगा. पटेलों को केशूभाई पटेल नहीं तोड़ सके तो हार्दिक कितने अलग कर पाएंगे.

ऐसे में सवाल यही उठता है कि मोदी आखिर कहेंगे क्या? मोदी जानते हैं थोड़ी नाराजगी जीएसटी को लेकर थी, आरक्षण को लेकर पटेल भी बीजेपी से नाराज हैं. 27 से जब पीएम मोदी मैदान में कूदेंगें तो पूरी पार्टी को उम्मीद है कि हवा बदल जाएगी. अब सवाल यही उठता है कि मोदी आखिर कहेंगे क्या? 27 से लेकर प्रचार के अंत कर पीएम मोदी की 25-30 रैलियां होंगी और ये गुजरात के कोने-कोने में होंगी. यानी वो चेहरा जिसे दिल्ली भेजा है वो उन्हें नहीं भूली. सूत्र बताते हैं कि मोदी जब कहेंगे कि आपने मुझे दिल्ली भेजा और आपको जो दिक्कतें हैं उसे मुझ तक पहुंचाने वाला बीजेपी का उम्मीदवार होगा. इसलिए बीजेपी को जिताएं ताकि मैं दिल्ली में भी रहूं तो आपका हाल मिलता रहे. जानकार बताते हैं व्यापारी हों या फिर वोटर कोई अस्थिरता नहीं चाहता. सब चाहते हैं कि दोनो जगह पर एक ही पार्टी की सरकार रहे. यानी गेमचेंजर वही चेहरा होगा नरेंद्र मोदी का.

इतने चुनावों को देखने के बाद गुजरात चुनावों को एक ही तस्वीर साफ दिखती है और वो ही नरेन्द्र मोदी. मुद्दे भले ही हर चुनाव में अलग रहे लेकिन उसका केन्द्र मोदी ही रहे. एक बार फिर पार्टी ने उन्हीं पर दांव लगाया है. अमित शाह लगे हैं बूथ मैनेजमेंट और कार्यकर्ताओं को एकजुट करने में और मोदी की ड्यूटी है गुजरात के वोटरों को आश्वस्त करना जिसमें में अब तक हर बार सफल होते आए हैं.

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