बात साल 1983 की है, जब 11 मई को देश के दो जाने माने अख़बार ‘प्रदीप’ और ‘आज’ के फ्रंट पेज पर एक खबर प्रकाशित होती है। खबर हैरतअंगेज थी, जिसने मई महीने का तापमान और बड़ा दिया था और साथ ही इस खबर ने सरकार समेत नौकरशाहों की भी कुर्सियां हिला दीं। इस खबर में बेबी की मौत की खबर छपी थी। खबर में लिखा था कि ‘बॉबी (बेबी) की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई है और उसकी लाश को कहीं छुपा दिया गया है।’
बिना किसी FIR या पुख्ता सबूत के इन अखबारों ने अपने संवादाताओं पर विश्वास दिखा कर इस खबर को प्रकाशित कर दिया। जिसके बाद कई और मीडिया ने भी ‘कहां है बॉबी?’ का राग अलापना शुरू कर दिया। बिहार में इसकी आग फैलने में ज्यादा देर नहीं लगी। जैसे जैसे मई के महीने का सूरज सर चढ़ रहा था बॉबी नाम का पारा भी नेताओं के पसीने छुड़ा रहा था।
क्या आप जानते हैं कि, कौन थी यह बॉबी जिसके मरने की कोई खबर ना होते हुए भी उस समय के देश के दो बड़े अखबार ‘आज’ और ‘प्रदीप’ ने रिस्क लेते हुए फ्रंट पेज पर उसकी खबर छाप दी, आइए जानते हैं-
बॉबी उर्फ बेबी बिहार विधान परिषद की सभापति और कांग्रेस नेता राजेश्वरी सरोज दास की गोद ली बेटी थी। बेबी का असली नाम श्वेत निशा त्रिवेदी था। पर सब प्यार से बेबी बुलाया करते थे और उनकी मौत के बाद नाम को बेबी से बदलकर बॉबी रख दिया गया।
कहाँ जाता है कि बॉबी ने अपने राजनीतिक पारिवारिक धरोहर का फायदा उठाया और बॉबी (श्वेत निशा तिवारी) को 1978 में विधानसभा सचिवालय में टेलीफोन ऑपरेटर की नौकरी मिली। जो बाद में टाइपिस्ट बन गईं।
उस समय की खबरों के मुताबिक बॉबी इतनी खूबसूरत थी की जो भी उन्हें देखता था, बस देखता ही रह जाता था। कुछ समय तो उनपर से नजरे हटाना मानो असंभव सा होता था। उनकी शादी भी हुई थी। पर गृहस्थ जीवन में जारी कलह के चलते उनका डिवोर्स हो गया। फिर उन्होंने दूसरी शादी भी कर ली। दूसरी शादी से उनके दो बच्चे थे। कहाँ जाता है कि राजनेताओं से उनके बहुत ही अच्छे संबंध रहे थे।
मौत की खबर सामने आने के वक्त बिहार में कांग्रेस की सरकार थी और मुख्यमंत्री डॉ जगन्नाथ मिश्रा हुआ करते थे। एसएसपी किशोर कुणाल महज एक-दो माह पहले ही राज्य में तैनात हुए थे। किशोर कुणाल की गिनती बेहद तेजतर्रार, ईमानदार, कर्तव्यनिष्ठ अफसरों में होती थी। अब इसे नेताओं की बदकिस्मती कहिए या कोई चमत्कार की बॉबी की मौत की खबर पर एसएसपी किशोर कुणाल की नजर पड़ गई। बिना देरी किए उन्होंने पुलिस को आदेश दिया कि इस मामले को लेकर एक एफआईआर दर्ज हो और इसके बाद उन्होंने खुद ही इस मामले की जांच शुरू कर दी।
जांच के दौरान सबसे पहले उन्होंने बॉबी की मां, कांग्रेस लीडर राजेश्वरी सरोज दास का बयान लिया जिन्होंने पुष्टि की कि, बॉबी की मौत 8 मई 1983 कि सुबह को हुई जिसके बाद उनकी लाश को एक कब्रिस्तान में दफना दिया गया। बता दें कि बॉबी हिन्दू थी पर उन्होंने कॉन्वेर्ज़न कर के ईसाई धर्म अपना लिया था।
मां राजेश्वरी सरोज ने किशोर कुणाल के सामने बॉबी के पोस्टमार्टम की दो रिपोर्ट पेश की; जिसमें पहली रिपोर्ट में मौत की वजह ज्यादा खून बहना बताया गया। साथ ही दूसरी रिपोर्ट कहती थी कि बॉबी की मौत हार्ट अटैक के कारण हुई थी। इसके बाद पुलिस का सर चकराना शुरू हो गया। ऑफिसर किशोर कुणाल ने इस मौत में हुई साजिश की बू को भाप लिया था। उन्होंने बिना देरी किए हुए कब्रिस्तान से बॉबी के शव को निकलवाया और फिर से पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया।
कुछ समय बाद, जब पोस्टमार्टम की रिपोर्ट सामने आई तो मौत का कारण जानकर सबके होश ही उड़ गए। रिपोर्ट में लिखा था कि बॉबी की मौत ना तो खून के बहने से हुई है ना ही हार्ट अटैक के कारण बल्कि मौत का असली कारण जहर था। रिपोर्ट के अनुसार बॉबी की मौत ‘मेलाथियान’ नाम के एक जहर खाने की वजह से हुई थी।
किशोर अपनी टीम के साथ बॉबी के सरकारी बंगले पहुंचे। अब वो समय आ गया था जब यह केस राज्य का सबसे मिस्टिरियस मर्डर केस बन चुका था। कार्यवाही के दौरान बेबो के सरकारी बंगले के पास एक आउटहाउस था। जिसमें रहने वाले दो युवकों से पूछताछ भी की गई। पूछताछ के दौरान उन लोगों ने बताया की 7 मई 1983 की रात को कांग्रेस के नेता राधा नंदन झा का बेटा रघुवर झा, बॉबी से मिलने आया था, वो दोनों अंदर थे की तभी अचानाक बॉबी को पटना के आईजीआईएमएस अस्पताल में भर्ती कराया गया। 8 मई 1983 को सुबह के समय इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई।
पुलिस की जांच जारी थी, एक के बाद एक कांग्रेस के नेता, मंत्री सब शक की नोक पर थे। लेकिन तभी इस कहानी में एक और ट्विस्ट आया। पुलिस के हाथ कोई बड़ा सबूत लगा था। पुलिस आगे की कार्यवाही करने वाली थी। की तभी 44 MLA और दो मिनिस्टर सीएम के ऑफिस पहुचे। इन MLA में विपक्ष के भी MLA शामिल थे। उन सबने मुख्यमंत्री से कहा कि अगर इस मामले की जांच और बढ़ी या इस मामले को बिहार पुलिस से लेकर सीबीआई को ट्रांसफर नहीं किया गया तो हम आपकी सरकार को गिरा देंगे। सत्ता के कांग्रेस के मुख्यमंत्री के हाथ बांध दिए और उन्होंने 25 मई 1983 को इस केस को बिहार पुलिस से लेकर CBI के हाथों में थमा दिया। उस समय के अखबारों की माने तो मुख्यमंत्री का कहना था कि उनपर बहुत राजनीतिक दबाव बनाया गया।
अब केस की जांच सीबीआई के हाथों में थी। केंद्र भी इस मामले में हाथ डालने से डर रहा था। अपनी सत्ता को बचाने के लिए लोकतंत्र और संविधान की हत्या कर दी गई। CBI ने इस मर्डर को आत्महत्या का रूप दे दिया।
उस समय के मीडिया ने इसका विरोध भी किया था क्योंकि रिपोर्टर के अनुसार सीबीआई की टीम का एक भी सदस्य जांच के लिए पटना कभी आया ही नहीं। न डॉक्टरों से मुलाकात, न जांच पड़ताल, न गवाहों से बातचीत कुछ नहीं। बस दिल्ली के दफ्तर में बैठ कर इस मौत की कहानी को गाढ़ा गया।
बॉबी की आत्महत्या का कारण प्रेम प्रसंग बताया गया। CBI ने रिपोर्ट में दावा किया कि सेंसिबल नाम की एक टेबलेट खाकर बेबी ने आत्महत्या कर ली। इतना ही नहीं पुलिस की जांच में कहीं भी जिक्र न होने वाले एक सुसाइड नोट को भी पेश किया गया।
पेश की गई इस रिपोर्ट को कोर्ट भी मंजूर कर लेता है और इस तरह इस केस को यहीं बंद कर दिया जाता है। आज तक यह केस नेताओ के सफ़ेद कुर्ते के पीछे छिपी काली करामातों की कहानी कहता है।
उस समय की मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार केस खत्म होने के बाद एक नेता ने अपने बयान में कहा, कि ‘यदि बाॅबी सेक्स स्कैंडल को हम तब रफा-दफा नहीं करवाते तो लोकतंत्र खतरे में पड़ जाता।’
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