नए शिक्षकों की बाट जोहती संस्कृत पाठशालाएँ

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रिपोर्टर- अजीत सोनी
प्रयागराज। शंकरगढ़ नगर पंचायत के अंर्तगत वार्ड नंबर 10 हज्जी टोला शंकरगढ़ में उत्तर प्रदेश माध्यमिक संस्कृत शिक्षा परिषद लखनऊ द्वारा मान्यता प्राप्त कमलाकर संस्कृत पाठशाला अपने निर्धारित समयानुसार संचालित हो रहा है। लेकिन समुचित भवन तथा पर्याप्त शिक्षाओं के अभाव में यह कब दम तोड़ दे कोई नही जानता ।  ज्ञात हो कि इस समय  वर्तमान में प्रदेश भर में करीब 1151 संस्कृत विद्यालय चल रहे हैं जिसमे अगर कागज की बात करें तो इन संस्कृत विद्यालयों में पढ़ने वाले छात्रों  की संख्या करीब 88 हजार से भी  अधिक है। अगर प्रयाग जनपद की बात करें तो यहाँ कुल 66 इस तरह की पाठशालाएं संचालित हो रही हैं।
पड़ताल करने पर पता चला कि शंकरगढ़  रियासत के तत्कालीन राजा कमलाकर सिंह ने इस संस्कृत पाठशाला की आधारशिला सन 1942 में रखी थी। जानकारों  ने बताया कि शंकरगढ़ के तत्कालीन राजा कमलाकर सिंह के उस समय तक कोई  पुत्र नही था। राजा मांडा ने राजा कमलाकर सिंह को सलाह दिया कि एक संस्कृत पाठशाला खोलवा दीजिये। उसमे ब्राह्मणों के बच्चे पढ़ेंगे , वे संस्कृत, वेद, पुराण,आदि की शिक्षा लेंगे। जिससे आपको ब्राह्मणों का आशीर्वाद मिलेगा। बताने वाले तो यहाँ तक बताते हैं कि इसी संस्कृत पाठशाला की स्थापना के कारण ही राजा कमलाकर सिंह को पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। सन 1942 में स्थापित यह संस्कृत पाठशाला पहले राम भवन स्थित राजा की कोठी में चलती थी। यह संस्कृत पाठशाला, कुछ दिन पहले जंहा राजा कमलाकर सिनेमा हाल हुआ करता था वहाँ संचालित होने लगी। कुछ समय बाद वहाँ राजा कमलाकर सिनेमा हॉल का निर्माण करा दिया गया जिससे उक्त पाठशाला का पठन पाठन प्रभावित होने लगा।
अतः इस पाठशाला को छतरी कोठी मैदान स्थित बंगला में स्थानांतरित कर दिया गया। कुछ महीनों बाद बुनियादी सुविधाओं व विभागीय जांच के कारण वहाँ पाठशाला चलाना असुविधाजनक हो गया। लोग बताते है कि विद्यालय में अध्यापन करा रहे तत्कालीन तीन शिक्षकों ने पाठशाला का स्थायी भवन बनाने के लिए आपस मे चंदा इकट्ठा किया और लगभग बीस हजार की लागत से पत्थरों द्वारा निर्मित फांसी घर से लगभग 300 मीटर आगे हज्जी टोला में  पाठशाला का निर्माण करवाया।
जानकारों ने बताया कि इस पाठशाला के प्रथम प्रधानाचार्य बनारसी गुरु थे। इनकी अगुवाई में ही इस पाठशाला की आधार शिला रखी गई। इनके बाद सोहरवा के रामानुज मिश्रा प्रिसिपल हो गए।  सन 1989 में इनके रिटायर्ड होने के बाद राजा शंकरगढ़ के राज पुरोहित लक्ष्मी निवास त्रिपाठी इस विद्यालय के कार्यवाहक प्रिंसिपल बनाये गए। सन 1994 में बालकृष्ण त्रिपाठी प्रिंसिपल हो गए। लक्ष्मी निवास के रिटायरमेंट के बाद  2015 में प्रिंसिपल बालकृष्ण भी रिटायर हो गए। इनके रिटायर होने के बाद त्रियुगी मिश्रा कार्यवाहक प्रधानाचार्य बनाये गए। सन 2016 में ये भी रिटायर हो गए। अब इस पाठशाला के कार्यवाहक प्रधानाचार्य  के रूप में मौजूद कृष्ण देव मिश्रा के कंधे पर विद्यालय का पूरा दरमोदार है। लेकिन गौरतलब ये है कि इस पाठशाला का संचालन एक शिक्षक से कैसे होगा कह नही सकते। पाठशाला का महीनों से ताला नही खुला।
बताया गया पहले इस विद्यालय में लगभग 180 विद्यार्थी विद्याध्ययन करते थे, लेकिन वर्तमान में लगभग कक्षा 6 से 12 तक मे 37 विद्यार्थी ही पंजीकृत हैं। खोजबीन करने पर पता चला कि 2013 में इस विद्यालय की विभागीय जांच हुई थी जिसमें 38 विद्यार्थी पंजीकृत पाए गए लेकिन जांचकर्ताओं ने कोठी में बैठकर लीपापोती करके उक्त विद्यालय को बंद करने की संतुस्ति कर दी। दो तीन महीने के लिए यह विद्यालय बंद हो गया। शिक्षकों का वेतन रोक दिया गया। बाद में काफी प्रयास के बाद इस विद्यालय के संचालन संबंधी आदेश पारित तो हो गया। लेकिन मौके पर जाकर देखा गया तो जानकारी हुई कि इस विद्यालय में पठन पाठन के लिए समुचित व्यवस्था नही है। प्रश्न उठता है कि जहाँ सरकार भारतीय संस्कृति और संस्कृत भाषा को बढ़ावा दे रही है , वहीं इन संस्कृत पाठशालाओं के  जर्जर भवन के मरम्मत के लिए तथा शिक्षक नियुक्ति की तरफ़ कोई ध्यान नही दे रही है।

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