इम्मोब्लाइजेशन गन, चलाने वाला कोई नहीं, कैसे पकड़ेंगे तेंदुआ

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उपेन्द्र कुशवाहा

पडरौना कुशीनगर : जिले के आबादी में घुसे जंगली जानवरों को पकड़ने के लिए कुशीनगर में पर्याप्त संसाधन नहीं है। हालत यहा एक इम्मोब्लाइजेशन गन यानी जंगली जानवरों को बेहोश करने वाली गन को चलाने के लिए प्रशिक्षित डॉक्टर भी नहीं है। हाल ही में  कुशीनगर मे खड्डा के आबादी में घुसे तेंदुए ने कई लोगों को जख्मी कर दिया था।

असल में ऐसी परिस्थितियों से निपटने के लिए वन विभाग तैयार नहीं है। न ही प्रशिक्षित स्टाफ हैं और न ही आवश्यक संसाधन है। गोरखपुर जनपद में महज एक इम्मोब्लाइजेशन गन हैं जबकि  कुशीनगर में एक भी नहीं है। पिजड़ों की भी बात करें तो कुशीनगर मे  हाथ खाली हैं। ऐसे में आबादी में तेंदुआ घुस आने की घटना सामने आने पर लखनऊ से प्रशिक्षित चिकित्सक बुलाना पड़ता है। हालाकी इन डॉक्टरों के आने में काफी वक्त लग जाता है।

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बोले माइक

हरिगोविंद पाण्डेय वन्य जीवों के प्रति संवेदनशील होना होगा

प्रदेश सरकार के इको टूरिज्म के ब्रांड एम्बेसडर व वाइल्डलाइफ फिल्ममेकर माइक हरिगोविंद पांडेय कहते हैं कि वन्य जीवों के प्रति सरकारी अधिकारियों-कर्मचारियों के साथ आम नागरिक को भी संवेदनशील होना होगा। केवल सरकार के भरोसे मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाओं को रोका नहीं जा सकता है।
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माइक ने दिए सुझाव

रात में घर में खिड़की दरवाजे खोलकर न सोएं
शाम 7 बजे के बाद शौच आदि के लिए बाहर न जाएं
संवेदनशील क्षेत्रों में 15 से 20 लोगों का समूह बना कर ढोल और लुकारा लेकर शोर मचाएं
पालतू कुत्ते, बत्तख और मुर्गियां पिंजड़े में घर के अंदर ही रखें, वे अलार्म का काम भी करेंगे
माइक कहते हैं कि वन्य क्षेत्रों में भोजन, पानी की कमी और बढ़ती आबादी के कारण सुअर, तेंदुआ, बंदर, हाथी आदि आबादी का रुख करते हैं। तेंदुए अक्सर कुत्तों की तलाश में आबादी के निकट आ जाते हैं। इन्हें रोकने के लिए जंगल में भोजन और पानी का इंतजाम करना होगा।

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