पूर्व वित्त मंत्री ने कहा, ‘विश्व के प्रत्येक अर्थशास्त्री ने कहा कि हमें मांग पैदा करनी होगी और मांग पैदा करने का श्रेष्ठ तरीका है कि लोगों के हाथों में पैसा दिया जाए। यह सरकार इसे लेकर विफल रही है। मैं अपना आरोप दोहरा रहा हूं। आप पिछले 36 माह के दौरान मिले सबक अभी तक नहीं सीख पाए हैं। मुझे भय है कि आपके द्वारा सबक नहीं सीखे जाने के कारण 12 महीने और व्यर्थ हो जाएंगे और गरीब परेशानी झेलेगा और बुरी तरह झेलेगा।’
उन्होंने कहा कि 2004-05 में स्थिर मूल्यों पर जीडीपी करीब 32.42 लाख करोड़ रुपए थी जो संप्रग सरकार के सत्ता से हटने के समय तीन गुना से अधिक बढ़कर 105 लाख करोड़ रुपए हो गई। चिदंबरम ने कहा, ‘उसके बाद से क्या हुआ? 2017-18 में यह 131 लाख करोड़ रुपए थी। 2018-19 में यह 139 लाख करोड़ रुपए पर पहुंच गयी। 2019-20 में यह थोड़ा और बढ़कर 145 लाख करोड़ रुपए हो गई। 2020-21 में, जो वर्ष समाप्त होने वाला है, पहली छमाही के दौरान यह 60 लाख करोड़ रुपए के करीब रही और वर्षांत तक यह करीब 130 लाख करोड़ रुपए पहुंचेगी। इसका मतलब है कि हम वापस वहीं आ गए जहां हम 2017-18 में थे।’
उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार ने तीन साल में ‘अकुशल आर्थिक कुप्रबंधन’ किया है। चिदंबरम ने कहा, ‘माननीय वित्त मंत्री को मेरे द्वारा अकुशल शब्द का प्रयोग करने पर आपत्ति हुई। मैं संसद में कठोर शब्द का उपयोग नहीं कर सकता। मेरे पास जो उपलब्ध है, उसमें मैं सबसे मृदु शब्द का उपयोग कर रहा हूं। अकुशल आर्थिक कुप्रबंधन के तीन वर्षों के कारण का अर्थ है कि 2020-21 में हम ठीक वहीं पहुंच गये जहां हम 2017-18 में थे।’
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