कुशीनगर में गांव के मेले में दुकान लगाकर बेची गयी थी जहरीली शराब

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रिपोर्ट उपेन्द्र कुशवाहा
पडरौना,कुशीनगर : उत्तर प्रदेश के पूर्वी छोर एवं बिहार प्रान्त के सीमा से निकलने वाली नारायणी नदी के किनारे दियरा में स्थित कुशीनगर जनपद के तरयासुजान थाना क्षेत्र के लगभग दर्जनों गांवों में मिथाइल अल्कोहल से निर्मित जहरीली शराब का कारोबार सिस्टम के रहमो करम पर वर्षों से चला आ रहा है। इस जहरीली शराब से लगभग दर्जन भर गरीबों की मौत हो चुकी है, कुछ का इलाज भी चल रहा है। प्रथम जांच के क्रम में यह बात साफ हो गयी है कि जीस शराब से इन लोगों की मौत हुई थी, वह शराब एक गांव के मेले में खुलेआम बेची गयी थी। मेला मतलब भीड़ भाड़ का वह जगह जिसे नियंत्रित रखने के लिए वहां पुलिस अधिकारी सहित अन्य कर्मचारी भी मौजूद रहे होंगे। आज इसी का पड़ताल हमारे तमकुहीराज तहसील के संवाददाता *अशोक कुमार मिश्र* ने किया है।

सिस्टम पर सवाल मेले में कैसे बिक रहा था शराब
शासन के निर्देश पर शुरू हुई मजिस्ट्रेटी जांच में यह बात खुलकर सामने आई कि गांव में लगने वाले मेले में शराब बेची जा रही थी। अब सवाल यह उठता है कि जब इतने भीड़ भाड़ और पुलिस के निगरानी में लगने वाले मेले में दुकान लगाकर शराब बेची जा रही थी, मतलब सिस्टम …….?
बीते मंगलवार को जांच के क्रम में सीओ यातायात गोरखपुर सुमित शुक्ला, ज्वाइंट मजिस्ट्रेट अभिषेक पांडेय शासन के निर्देश पर तरयासुजान थाने के जहरीली शराब से प्रभावित गांव बेदूपार एहतमाली, जवहीँ दयाल चैनपट्टी व खैरटिया जलाल छापर में पहुँच मृतकों के परिजनों का बयान दर्ज करते हुए ग्रामीणों से भी जानकारी जुटाई। जिसमे मेले में शराब बेचने की बात स्पष्ट हुई। ऐसे में सिस्टम पर सवालों का उठना लाजमी है।

नया नही है जहरीली शराब का यह खेल

जहरीली शराब का यह दूसरा मामला है, पहली घटना बगल के सेवरही थाना क्षेत्र में लगभग दो दशक पहले हुई थी, तब कच्ची के खेल की शुरुवात हुई थी, तब भी इसके सेवन के बाद दर्जन भर लोग मौत को गले लगाए थे। आज दो दशक बाद पुनः इस घटना की पुनावृत्ति पर नजर दौड़ाये तो जहरीली शराब का यह कारोबार कभी बन्द नही हुआ। सूत्र बताते है कि इसके कारोबारी सिस्टम पर इस तरह हावी हो चुके थे कि जो भी आया, चाहकर भी उससे बाहर नही निकल पाया।
कुछ पुलिस अधिकारी आये जो इसके खिलाफ थे, लेकिन सिस्टम के सामने उनकी चल नहीं पायी। आज जीस जहरीली शराब कांड को लेकर हाय तौबा मचा है, उसके जिम्मेदार केवल और केवल सर्किल के ही पुलिस अधिकारी नहीं है। लेकिन गांव में कहावत है, “जिसकी लाठी, उसकी भैस” मतलब मातहतों को बलि का बकरा बना खेल को खत्म करने की योजना। इसका आशय यह भी नहीं कि स्थानीय सिस्टम गुनाहगार नही है, असली गुनाहगार तो वही है जो दूसरे के इसारे या दबाव में गुनाह करता या करता है। मतलब यह खेल नया नहीं दशकों से फैला वह मकड़ी का जाल है, जो गांवों से लेकर ऊपर तक अपने जाल में बहुतों को जकड़ रखा है। जानकर बताते है अगर जांच में खेल नही हुआ तो इसकी आंच गांव से लेकर देश की राजधानी तक पहुँच सकती है।
सब जानते है अधिकारी
कच्ची का कारोबार तो लगभग हर थाना क्षेत्र में होता है, लेकिन कुशीनगर जनपद के नारायणी नदी (दियरा) व बिहार सीमा से लगे इलाकों में यह अच्छा खासा व्यवसाय का रूप धारण कर चुका है। जानकर बताते है कि बिहार में शराब बंदी के बाद सीमा से लगे इलाकों के कई गांवों के प्रभावशाली, रंगरूट, झपटेबाज इस धंधे में कूद चुके है। अवैध कारोबार से हुई आमदनी ने उनका रुतबा सिस्टम में ऐसा बढ़ा की आम आदमी भी उससे दहशत खाने लगा है।
कौन करता है यह खेल
इस खेल में लगे किसी भी व्यक्ति को डर नही लगता है, अवैध शराब का जखीरा बड़े पैमाने पर बरामद करने और उसे फिर नष्ट करने के बहाने जगह पर पहुँचाने की महारथ हासिल है। जानकर बताते है बरामदगी और मुकदमें की भिन्नता सबको पता है। उसके बाद बचे अवैध शराब को नष्ट करने का आदेश और उसके नष्ट करने के तरीके का खुलासा ने भी सिस्टम को कटघड़े में लाकर खड़ा कर दिया है।

आबकारी पर क्यों नही पड़ती नजर

अवैध शराब के कारोबार को रोकने का पहला जिम्मा आबकारी विभाग का है, लेकिन कोई भी घटना हो लोगों की पहली नजर पुलिस पर ही पड़ती है। जानकर बताते है कि अवैध शराब के कारोबार के पीछे का सबसे बड़ा खेल आबकारी विभाग ही खेलता है। कौन कौन इस कारोबार को करता है, यह कारोबार किस किस नये जगह पर शुरू होता है, मिथाइल अल्कोहल से भरा टैंकर कब आता और कहा उतरता है। इसकी जनकारी सबसे पहले आबकारी को होता है। जानकर बताते है कि ऐसे तो आबकारी विभाग के लोग नजर नही आते लेकिन हर महीने के एक निश्चित तारीख को दियरा क्षेत्र के कई गांवों में दिख जाते है, जहाँ उनकी पूरी आवभगत होती है। कभी कभार आबकारी विभाग अपने खानापूर्ति के लिए सक्रिय तो होता है, लेकिन उसका लचीला कार्यवाही (60 आबकारी एक्ट) तक ही सीमित रखने की कहानी का मतलब समझने के लिए आबकारी विभाग के सिस्टम ?
कैसे होता है बरामदगी का खेल
जब अवैध शराब की बरामदगी शुरू हो जाय तो समझ ले की इसके पीछे कोई बड़ा खेल होने वाला है। जानकारों की माने तो जब किसी थाने के थानेदार पर दबाव की स्थिति बनती है तो वह बड़ी बरामदगी के सहारे उच्चाधिकारियों का तारा बना अपने काबिलियत का परिचय देता है। और यह क्रम लगातार दो से तीन दिन तक चलता, फिर…….?
मतलब को मतलब में ही समझे, पुलिस जब चाहे, जितनी चाहे अवैध शराब की बरामदगी कर लेती है, लेकिन उसकी निद्रा कभी कभी ही क्यों टूटती है। मतलब खेल में ही खेल होता है। जानकर यह भी बताते है कि बहुत कम मौका ही ऐसा होता है, जब बरामदगी के साथ आरोपी भी पुलिस के गिरफ्त में आते है। मतलब…….?
एसी में बैठे नेता आर्थिक सहायता के मरहम से ही भर रहे जख्म
इतनी बड़ी घटना के बाद जहाँ कमिश्नरी के सभी बड़े अधिकारी घटना का दौरा किये, वहीं विधायक अजय कुमार लल्लू, एमएलसी दवेंद्र सिंह व पूर्व मंत्री भाजपा नेता डॉ. पीके राय, सपा नेता पूर्व विधायक को छोड़ दे तो के दूसरे किसी भी जनप्रतिनिधि ने मृतक के परिजनों से मिलकर उन्हें ढाढ़स बढ़ाया। ग्रामीणों का कहना है कि चुनाव के दिनों में हम लोगों का सोना हराम हो जाता है,लेकिन इस विपत्ति में आंशू पोछने तक का समय किसी नेता के पास नहीं है। ग्रामीणों की यह बातें हर सुनने वाले को चुभ रही है।
साहब का जलवा
तमकुहीराज सीओ पेसी में तैनात एक साहब का स्थानांतरण चार महीने पूर्व सदर के लिए हो गया, लेकिन सिस्टम के बदौलत साहब आज भी यहाँ के व्यवस्था से अलग नही कर पाये है। जानकर बताते है कि उक्त साहब का हाइवे से विशेष लगाव है,उसका मोह उन्हें यहां से निकलने नही दे रहा। उनका जलवा आज भी कायम है।
कई चेहरे अचानक हो गए ओझल
कभी सुबह से शाम तक थाना,चौकी,तहसील के साथ ही साहबों के इर्द गिर्द नजर आने वाले बहुत से चेहरे दिख ही नहीं रहे। जिनके जलवे को देख आम आदमी दहशतजदा होने लगता था,उनके अचानक नजर न आने पर आम आदमी सवाल कर रहा। सूत्र बताते है कि जो चेहरे दिख नही रहे उनके पीछे की कहानी भी अवैध शराब कारोबार तक पहुँचती है,ऐसे में वे हटना ही उचित समझें है।
जानकर बताते है कि सरकार और शासन की मंशा के अनरूप पुलिस ने अवैध शराब से जुड़े सबूतों के आधार पर सैकड़ों लोगों की सूची बनाई है,जिसके सामने आने से जहां बहुतों के पैर से जमीन खिसक जाएगी,तो बहुत लोग समाज के सामने …….?

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