मेडिकल कॉलेजों में यौन उत्पीड़न: एक खामोश त्रासदी

भारत के महाराष्ट्र राज्य के 28 विभिन्न मेडिकल कॉलेजों में 308 छात्रों पर किए गए एक सर्वेक्षण के शोध पत्र ने एक चिंताजनक तथ्य उजागर किया है: लैंगिक भेदभाव और यौन उत्पीड़न इन परिसरों में व्यापक रूप से फैला हुआ है। “भारतीय चिकित्सा नैतिकता जर्नल” में प्रकाशित “यौन उत्पीड़न और लैंगिक भेदभाव के बारे में स्नातक चिकित्सा छात्रों के दृष्टिकोण और धारणाएँ: एक सर्वेक्षण-आधारित अध्ययन” शीर्षक वाले इस शोध पत्र में चौंकाने वाले आँकड़े सामने आए हैं, जिनपर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है। यह अध्ययन केवल एक झलक है, एक बड़ी समस्या की ओर इशारा करता है जिससे देश के भविष्य के डॉक्टरों को जूझना पड़ रहा है। यह शोध पत्र हम सभी को जागरूक होने और इस समस्या के समाधान के लिए सामूहिक प्रयास करने के लिए प्रेरित करता है।

लैंगिक भेदभाव और यौन उत्पीड़न: एक व्यापक समस्या

सर्वेक्षण के निष्कर्ष

सर्वेक्षण में भाग लेने वाले 43.2% छात्रों ने लैंगिक भेदभाव या यौन उत्पीड़न का सामना करने की बात स्वीकारी है। यह एक भयावह आँकड़ा है, जो इस समस्या की गंभीरता को उजागर करता है। प्रश्नावली में छात्रों द्वारा वर्णित घटनाओं की विविधता और गंभीरता इस बात की ओर इशारा करती है कि यह समस्या केवल व्यक्तिगत घटनाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि एक व्यवस्थित समस्या है जिससे निपटने के लिए व्यापक बदलाव की आवश्यकता है। इसके अलावा, 42.5% छात्रों ने ऐसी घटनाओं की रिपोर्ट करने में डर महसूस किया, जबकि 62.7% का मानना था कि रिपोर्टिंग उनके ग्रेड और भविष्य के करियर पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकती है। यह दर्शाता है कि इस तरह की घटनाएँ अक्सर अप्रतिवेदित रह जाती हैं।

पीड़ितों और अपराधियों की प्रोफ़ाइल

यौन उत्पीड़न की शिकार केवल महिलाएँ ही नहीं, पुरुष छात्र भी हुए हैं। घटनाओं में मौखिक उत्पीड़न, सेक्सिस्ट चुटकुले, अनुचित स्पर्श, छेड़छाड़, साथ ही छात्रावास में भोजन और सुविधाओं में भेदभाव शामिल थे। चिंताजनक बात यह है कि अधिकांश घटनाओं में अपराधी प्रोफ़ेसर, विभागाध्यक्ष, वरिष्ठ छात्र, बैचमेट, रेजिडेंट डॉक्टर और गैर-शिक्षण कर्मचारी जैसे अस्पताल के कर्मचारी और छात्रावास के वार्डन शामिल थे। यह स्पष्ट रूप से दिखाता है कि शक्ति असमानता यौन उत्पीड़न में एक प्रमुख कारक है।

जागरूकता की कमी और डर का माहौल

“एमबीबीएस पाठ्यक्रम का हिस्सा”

सर्वेक्षण से पता चला है कि कई छात्रों को लैंगिक भेदभाव और यौन उत्पीड़न के बारे में पर्याप्त जागरूकता नहीं है। कई मामलों में, इन घटनाओं को एमबीबीएस पाठ्यक्रम का “हिस्सा” माना जाता है, जो इस समस्या की गंभीरता को दर्शाता है। यह अज्ञानता ही इस समस्या के बढ़ने का एक प्रमुख कारण है। शैक्षणिक संस्थानों में यौन उत्पीड़न के प्रति संवेदनशीलता की कमी, इसे एक आम घटना के रूप में देखना और इसके खिलाफ आवाज़ उठाने में डर, यह सब मिलकर एक विषम माहौल बनाता है जहाँ पीड़ितों को न्याय नहीं मिल पाता है।

रिपोर्टिंग में बाधाएँ

छात्रों द्वारा यौन उत्पीड़न की रिपोर्ट न करने का मुख्य कारण है डर – ग्रेड और भविष्य के करियर पर नकारात्मक प्रभाव पड़ने का भय। यह एक गंभीर मुद्दा है जो यह प्रतिबिंबित करता है कि मेडिकल कॉलेजों में शिकायत प्रणाली कितनी कमजोर और प्रभावहीन है। इससे पता चलता है कि पीड़ितों को अपनी सुरक्षा और अपने अधिकारों के प्रति विश्वास नहीं है और वे अपनी शिकायतों को अनसुना कर दिए जाने का डर सहन करते हैं।

निष्कर्ष और समाधान

व्यवस्थित समस्या और सामूहिक समाधान

यह अध्ययन स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि लैंगिक भेदभाव और यौन उत्पीड़न मेडिकल कॉलेजों में एक व्यापक व्यवस्थित समस्या है, जो विभिन्न संस्थानों में समान प्रकार की घटनाओं से स्पष्ट होता है। इस समस्या के समाधान के लिए, मेडिकल कॉलेजों में सुरक्षा उपायों और मानकीकृत निगरानी प्रणाली को लागू करने की आवश्यकता है। साथ ही, लैंगिक संवेदनशीलता पर प्रशिक्षण प्रदान करना और यौन उत्पीड़न को पहचानने और उससे निपटने के तरीके सिखाना आवश्यक है। यह एक ऐसा कार्य है जो केवल सरकार या शैक्षणिक संस्थानों द्वारा नहीं किया जा सकता, बल्कि समाज के सभी वर्गों के सामूहिक प्रयास से ही यह संभव हो पाएगा।

लंबे समय तक प्रभाव

यौन उत्पीड़न और लैंगिक भेदभाव से पीड़ित छात्रों पर इसका लंबा समय तक शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव पड़ता है। चिंता, अवसाद, सामाजिक अलगाव और काम करने के माहौल में नकारात्मक प्रभाव, ये सब पीड़ित छात्रों पर गहरे और स्थायी निशान छोड़ सकते हैं। यह इस बात को और महत्व देता है कि इस मुद्दे से तत्काल और प्रभावी ढंग से कैसे निपटा जाए।

महत्वपूर्ण बिन्दु

  • महाराष्ट्र के मेडिकल कॉलेजों में लैंगिक भेदभाव और यौन उत्पीड़न एक व्यापक समस्या है।
  • 43.2% छात्रों ने किसी न किसी रूप में यौन उत्पीड़न या लैंगिक भेदभाव का अनुभव किया है।
  • पीड़ितों को रिपोर्ट करने में डर लगता है, और वे अपने करियर को प्रभावित होने का भय पालते हैं।
  • इस समस्या के समाधान के लिए सुरक्षा उपायों, मानकीकृत निगरानी प्रणाली और लैंगिक संवेदनशीलता प्रशिक्षण की आवश्यकता है।
  • यौन उत्पीड़न का पीड़ितों के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर और लंबे समय तक प्रभाव पड़ता है।

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