फूल वालों की सैर: दिल्ली की रंगीन परंपरा
क्या आपने कभी ऐसी जगह देखी है जहाँ हिन्दू और मुस्लिम भाईचारे से एक साथ मिलकर एक अनोखा त्योहार मनाते हैं? जी हाँ, दिल्ली के महरौली में हर साल मनाया जाने वाला ‘फूल वालों की सैर’ ऐसा ही एक अद्भुत त्योहार है जो सदियों से चली आ रही परंपरा और सांप्रदायिक सौहार्द का प्रतीक है। इस लेख में हम जानेंगे इस त्योहार की खूबसूरत कहानी और इसके पीछे के इतिहास को।
एकता और विविधता का त्योहार
‘फूल वालों की सैर’ महज एक त्योहार नहीं, बल्कि दिल्ली की गंगा-जमुनी तहज़ीब का अनूठा प्रतीक है। यह त्योहार ख्वाजा कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी की दरगाह और पांडव कालीन श्री योग माया मंदिर पर फूलों की चादर और छत्र चढ़ाने की परंपरा से जुड़ा हुआ है। दोनों ही समुदायों के लोग पूरे हर्षोल्लास के साथ इस आयोजन में भाग लेते हैं।
सदियों पुरानी परंपरा
इस त्योहार का इतिहास मुगल काल से जुड़ा हुआ है। कहा जाता है कि 1812 में मुगल शहज़ादे मिर्ज़ा जहांगीर को अंग्रेज़ों द्वारा इलाहाबाद भेज दिया गया था। उनकी माँ बेगम ज़ीनत महल ने उनकी वापसी के लिए मन्नत माँगी कि वह ख्वाजा बख्तियार काकी की मज़ार पर फूलों की चादर चढ़ाएंगी। जहांगीर के लौटने पर उनकी माँ ने अपनी मन्नत पूरी की, और इसी से ‘फूल वालों की सैर’ की शुरुआत हुई। यह त्योहार बाद में हिन्दू और मुस्लिम दोनों समुदायों का एक मिलन का त्योहार बन गया।
आधुनिक समय में ‘फूल वालों की सैर’
आज़ादी के बाद, 1960 के दशक में चांदनी चौक के व्यापारी योगेश्वर दयाल ने इस त्योहार को फिर से जीवित किया। अंजुमन सैर-ए-गुल फरोशां नामक एक समिति बनाकर, उन्होंने ‘फूल वालों की सैर’ को एक भव्य आयोजन का रूप दिया। आज, इस एक हफ़्ते के त्यौहार में सांस्कृतिक कार्यक्रम, खेल-कूद और कई और रोमांचक गतिविधियाँ शामिल हैं। इसमें पेंटिंग कॉम्पटीशन, कुश्ती और कबड्डी जैसे कार्यक्रम होते हैं, जो इस त्योहार को और भी खास बनाते हैं।
संरक्षण और चुनौतियाँ
हालांकि, आज के दौर में यह भी जरूरी है कि इस त्यौहार का स्वरूप सच्चे अर्थों में लोकतांत्रिक रहे। कुछ लोग इस बात पर चिंता व्यक्त करते हैं कि इस त्यौहार में राजनीतिक दख़ल तेज़ी से बढ़ रहा है और मूल भावना को नुकसान पहुंच रहा है। यह त्योहार हमेशा एक साधारण, प्रजातंत्र का हिस्सा, और अम्न-शान्ति और आपसी प्रेम का प्रतीक रहे इसके लिए हमें जागरुक रहने की आवश्यकता है।
Take Away Points
- ‘फूल वालों की सैर’ दिल्ली की गंगा-जमुनी तहज़ीब का प्रतीक है।
- यह हिन्दू और मुस्लिम दोनों समुदायों द्वारा मिलकर मनाया जाता है।
- इस त्योहार का इतिहास सदियों पुराना है और यह अनेक सांस्कृतिक और धार्मिक परम्पराओं का मिश्रण है।
- आधुनिक काल में भी इस त्यौहार का महत्व बना हुआ है, लेकिन इसका स्वरूप यथावत लोकतांत्रिक और आमजन के नेतृत्व वाला बना रहे इसके लिए ज़रूरी है कि समाज, बुद्धिजीवी और आम नागरिक सावधानी और जागरूकता बरते।

Leave a Reply