चलो रे डोली उठाओ कहार … 

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पडरौना,कुशीनगर : मशहूर फिल्म जानी दुश्मन का यह गीत कि … चलो रे डोली उठाओ कहार … भला किसने नहीं सुना होगा। बेटी की विदाई के वक्त यह गीत प्रासंगिक हो जाता है, लेकिन डोली में बेटी को विदा करने की इस परंपरा को लगभग भुला सा दिया गया था। मगर अब यह परंपरा फिर से जीवित हो उठी है और शादियों में अब विदा के वक्त सजी संवरी डोली और कहार कुशीनगर में दिखाई देने लगे हैं। विलुप्त हुई यह परंपरा अब शादियों में  चांद लगा रही है।
 दरअसल कुशीनगर जिले की ही नहीं है। बल्कि हर जगह शादियों में डोलियां नहीं दिखाई देती थीं और बेटी की विदा सीधे कार में बिठाकर कर दी जाती थी। डीजे पर बाबुल की दुआएं लेती जा या चलो रे डोली उठाओ कहार जैसे गीत बजते रहते थे और बेटी कार में बैठकर चली जाती थी। इस परंपरा को फिर से शुरू करने में पालकी वालों का बड़ा हाथ है। कुछ बैंडबाजे वाले डोली या पालकी की व्यवस्था कर देते हैं और कहीं हो न हो लेकिन कुशीनगर जनपद के पडरौना शहर से सटे सिधुआ बाजार में इन दिनों डोलियों की धूम है। दरअसल डोली को कहीं वीनस तो कहीं पालकी भी कहते हैं। वैसे  सिधुआ बाजार के ही रहने वाले कहार चांदबली प्रसाद गौंड बताते हैं कि इतिहास गवाह है कि पूर्व में जब शादियां होती थीं तो डोली में ही बेटी विदा की जाती थी। रामायण,महाभारत अन्य तमाम ऐतिहासिक ग्रंथों में डोली का उल्लेख बड़ी ही खूबसूरती के साथ दर्शाया गया है।
एक डोली को चार कहार उठाते हैं। कालांतर में डोली उठने की बात सिर्फ बातों के चलन तक ही सीमित रह गई थी,लेकिन अब ऐसा नहीं है। बेटी की विदा के वक्त डोली को अब बहुत कम अपनाया जा रहा है। डोली और कहार की व्यवस्था करने वाले संचालक झिंगट प्रसाद गोंड  बताते हैं कि इस के लग्न में डोली के ऑफर मिल रहा था,ऐसे में पुरानी परंपरा को जीवित रखते हुए उन्होंने डोली बनवा कर तैयार कर ली है । एक विदाई का वे 5 हजार से लेकर 10 हजार रुपये तक मेहनताना वसूलते हैं वे कहते हैं कि उन्होंने पुरानी परंपरा को कुशीनगर जिले के सिधुआ बाजार में जीवित करके दिखाया है। इससे उन्हें आत्मिक शांति की अनुभूति भी होती है और भारतीय संस्कृति को सुरक्षित रखने के लिए काम करने का मौका भी मिलता है।

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